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ददरी मेला के ऐतिहासिक भारतेंदु मंच पर शायरों ने पढ़ें शेरो शायरी

बलिया। अच्छे दिन वह दिन थे जब हम हिंदुस्तानी कहलाते थे ईद और होली आपस में मिलजुल कर मनाते थे। मंदिर में पूजा होती थी मस्जिद में अजान, यह हिंदुस्तान हमारा प्यारा हिंदुस्तान। तुलसी, अमीर कबीर और ग़ालिब की है ये पहचान…। यह शेर नगर पालिका परिषद की ओर से आयोजित ददरी मेला के भारतेंदु मंच पर अमरोहा से पधारे निकहत अमरोही ने अखिल भारतीय मुशायरा में पढ़ा। मुशायरा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जनपद न्यायाधीश गजेंद्र कुमार तथा कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि चन्द्रभानु सिंह ने फीता काटकर शुभारम्भ किया। इस मौके पर नपाध्यक्ष अजय कुमार व अधिशासी अधिकारी दिनेश कुमार विश्वकर्मा ने अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। इसके बाद आए हुए शायरों का मुख्य अतिथि ने अंगवस्त्रम तथा माल्यार्पण कर सम्मानित किया। इसी क्रम में शेर सुनते हुए निकहत अमरोही ने सुनाया कि राह सुनसान है दिल परेशान है ऎसी तनहाई में किसके घर जाऊगी…। जबकि सुल्तानपुर से पधारे
सिराज सुल्तानपुरी ने सुनाया कि तुम्हारी बात का कैसे यकीन कर लू मैं तरह – तरह का अभी व्यान बाकी है…। हमारे दर्द को तो कोई दर्द समझा है चलो सेराज कोई मेहरबान बाकि है…! तारिक अनवर ने सुनाया कि देख लेना इश्क में एक ऎसा दिन ऐसा भी आयेगा , दिल को हम समझायेगे और दिल हमे समझायेगा। काविश उसमान ने खूब सूरत हो मेरी जान हो अच्छी हो तुम, ये मत भूलो कि एक फौजी की बीबी हो तुम…। नदीम फारूख ने शेर पढ़ा मकान बेचकर बेटी की शादी मत करना निकाह करके उसी को दे देना। रूड़की उत्तराखंड से पधारे सज्जाद झंझट ने सुनाया अब इशारों को उनके नाचती है यह सियासत तो उनकी वादी है पहले होते थे चलते चमचे चांदी के चमचों की रोज चांदी है। अब आ भी जा नखरे ना दिखा मुझे। दिल है मेरा मोबाइल तुम सीम हो मेरी जान। गुले शब्बा ने। सुनाया कि मुझे तनहाई में अश्को से भिगोते क्यो हो बाद मरने के मेरे कब्र पर रोते क्यो हो। मीशम गोपालपुरी ने सुनाया कि आप मुझको सताते बहुत हैं कम हंसाते रूलाते बहुत हैं। आओ उनको सँभलना सीखाए पी के जो लड़खड़ाते बहुत है! इतना बेजान हूँ एहसास के मारो की तरह, फूल चूभते हैं मेरे जिस्म में खारो की तरह। समीर अली ने सुनाया कि मुसीबत में शरीफो की शराफत कम नही होती, करो सोने के सौ टुकडे तो कीमत कम नही होती। अज्म शाकिरी ने सुनाया की सुबह तक चाहतो के दीए आंधियों में जलायेगा कौन, दास्तान खत्म होने को है अब मोहब्बत निभायेगा कौन। ताहिर फराज ने सुनाया कि दिन वो भी क्या थे जब हम मिलकर देश में रहते थे, अपनी मिट्टी की खुशबू के परिवेश में रहते थे। मुशायरा का संचालन नदीम फारूख ने किया। देर रात तक प्रदेश के कई जनपदों से आए शायरों को सुनने के लिए लोग जमे रहे शेर और शायरी का मुकाबला चलता रहा और लोग तालियां बजाकर वाहवाही देते रहे।

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