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बलिया की माटी ने खो दिया एक कीमती हीरा

चमकी पानी गिरने का डर है,
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके पास घर है,
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा,
वह क्या है जो दिखता है धुआं-धुआं सा..

नुरुल होदा खांन की एक विशेष रिपोर्ट

इस पंक्ति को रचने वाले सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। सोमवार को नई दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। वह कई दिनों से बीमार थे और अस्पताल में भर्ती थे। वह 84 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर सुनते ही साहित्यजगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनका पैतृक गांव बलिया के बैरिया विधान सभा में चकिया गांव के नाम से जाना जाता है। गांव के लोग बताते हैं, कि साहित्‍य जगत में शीर्ष ऊंचाईयों पर जाने के बावजूद भी जब वह गांव आते थे, तो उनकी भाषा पूरी तरह ठेठ भोजपूरी ही होती थी। वह अपने सहपाठियों से ठेठ भोजपूरी में ही बात करते थे, उनका हाल पूछते थे, और इस दौरान यदि कोई उनसे हिंदी में बात करने लगता था, तो उन्‍हें डांट भी देते थे। कहते थे हम अभी अपनी मिट्टी पर हैं, हमे अपनी गंवई भाषा में ही बात चाहिए। उसी गांव में सोमवार की रात जब उनके निधन की सूचना मिली तो पूरा गांव सन्‍न रहा गया। हालांकि उनके मकान में ताला बंद रहता है और पूरा परिवार दिल्ली रहता है, फिर भी साल में दो-तीन बार वह अपने गांव चकिया जरूर आते थे।
सुदिष्ट बाबा इंटर कालेज सुदिष्टपुरी रानीगंज में शिक्षक की नौकरी से अपना कैरियर शुरू करने वाले डा.केदार नाथ सिंह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। द्धाबा में उनके साथ खेले, पढ़े बढ़े लोगों को जब यह सूचना मिली तो, सभी को गहरा धक्‍का लगा। द्धाबा में चारों ओर अगले दिन मंगलवार को बस उनकी ही चर्चा होते दिखी। द्धाबा वासी कहते हैं कि तमाम ऊंचाइयों के बाद भी उन्‍हें भोजुपरी व अपनी माटी से विशेष लगाव था। यही वजह है कि उनके निधन की सूचना मिलते ही सभी लोग काफी मर्माहत हैं।
जब वह गांव आए थे। राज्‍य सभा सांसद हरिवंश जी के साथ तब ही एहसास हुआ कि डा.सिंह ने अपनी कविताओं में जो मानवीय संवेदनाएं उकेरी हैं, वह अन्यत दुर्लभ है। उनकी कविताओं में पूरी तरह से लोक समाहित है। अकाल में सारस, उत्तर कबीर, कब्रिस्तान में पंचायत आदि के रचयिता केदार नाथ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत हैं। उनका जन्म 1934 में हुआ था, वह अपनी माता पिता का इकलौता संतान थे। प्राथमिक शिक्षा गांव से सटे मिल्की प्राथमिक स्कूल में हुई। उसके बाद यूपी कालेज वाराणसी पढ़ने चले गए। इंटरमीडिएट के बाद बीएचयू से बीए, एमए व पीएचडी की उपाधि ली। घर के सामने बहने वाले नाले पर भी बिना नाम की नदी शीर्षक से कविता लिख डाले। यूपी व बिहार को जोड़ने वाले मांझी पुल पर उनकी कविता बेहद लोकप्रिय हुई।

कविता संग्रह : अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, तालस्ताय और साइकिल।
आलोचना : कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान, मेरे समय के शब्द, मेरे साक्षात्कार।
संपादन : ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएं, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका), शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)
सम्मान : मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान आदि।
जब एक इंटरव्‍यू में कहा-साहित्‍य में नहीं आ रहे नए लोग
साहित्‍य की दुनिया में अब नए लोग नहीं आ रहे हैं, यह सही बात है। आजादी की लड़ाई बहुत सारे लोगों ने मिल कर लड़ी थी। पुराने जाते रहे, नए आते रहे। उसके बाद पार्टियों का बनना शुरू हुआ। फिर लोग अलग-अलग पार्टियों में जगह बनाते गए। वह प्रक्रिया अभी रुकी नहीं है। चल रही है। यह अलग बात है कि हम उसे पसंद करें न करें। लोग पढ़-लिख कर बाहर आते हैं और कोई न कोई दल उन्हें पकड़ लेता है या वे खुद पकड़ लेते हैं। यह प्रक्रिया उस तरह तो नहीं है, क्योंकि तब लोग आजादी की लड़ाई में घुस कर आते थे और जो उस लड़ाई में आता था उसे पहचान लिया जाता था। अब वह प्रक्रिया नहीं है। प्रक्रिया बदल चुकी है। अब वे सीधे दलों में आते हैं, राजनीति में आते हैं। नेता के रूप में उन्हें पहचानने में समय लगता है। जहां तक साहित्य की बात है, वहां भी प्रक्रिया थोड़ी बदली है। साहित्य अपने आप बनता है, उसके लिए पढ़ाई-लिखाई भी जरूरी नहीं है। फिर अब साहित्य केवल कागज तक सीमित नहीं है। अब दूसरी कई जगहें बन गई हैं और वहां बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है। मगर दिक्कत क्या है कि हम जैसे लोगों तक वह साहित्य पहुंच नहीं पाता। इसलिए व्यक्तिगत रूप से मैं इस प्रक्रिया को पसंद नहीं करता। हालांकि वहां कुछ अच्छा भी लेखन हो रहा है। हालांकि कभी-कभार ही ऐसा हो पाता है। इसके अलावा कागज पर छपने वाले और परदे पर दिखने वाले साहित्य के बीच संबंध नहीं बना है। छपा हुआ साहित्य लोक तक नहीं पहुंच पा रहा है। विदेशों में जो चीजें छप कर लोगों तक पहुंचनी चाहिए, वे पहुंच जाती हैं। हालांकि इसमें भी दो बातें हैं। टीएस ईलियट और गिन्सबर्ग दो कवि हुए। गिन्सबर्ग का कहना था कि मुझे ईलियट से बड़ा कवि बनना है। तो गिन्सबर्ग मंचों पर अपनी कविताएं गाकर भी सुनाते थे। इस तरह वे ईलियट से कुछ अधिक लोकप्रिय हो गए।
सदैव संदेश देती रहेगी केदारनाथ सिंह की यह कविता
मेरे बेटे,कुंए में कभी मत झांकना, जाना
पर उस ओर कभी मत जाना, जिधर उड़े जा रहे हों काले-काले कौए, हरा पत्ता कभी मत तोड़ना,और अगर तोड़ना तो ऐसे कि पेड़ को ज़रा भी न हो पीड़ा, रात को रोटी जब भी तोड़ना, तो पहले सिर झुकाकर, गेहूं के पौधे को याद कर लेना, अगर कभी लाल चींटियां दिखाई पड़ें, तो समझना आंधी आने वाली है,अगर कई-कई रातों तक, कभी सुनाई न पड़े स्यारों की आवाज़, तो जान लेना बुरे दिन आने वाले हैं, मेरे बेटे, बिजली की तरह कभी मत गिरना,और कभी गिर भी पड़ो, तो दूब की तरह उठ पड़ने के लिए, हमेशा तैयार रहना, कभी अंधेरे में, अगर भूल जाना रास्ता, तो ध्रुवतारे पर नहीं, सिर्फ़ दूर से आनेवाली कुत्तों के भूंकने की आवाज़ पर भरोसा करना, मेरे बेटे, बुध को उत्तर कभी मत जाना, न इतवार को पच्छिम,और सबसे बड़ी बात मेरे बेटे, कि लिख चुकने के बाद इन शब्दों को पोंछकर साफ़ कर देना, ताकि कल जब सूर्योदय हो, तो तुम्हारी पटिया रोज़ की तरह धुली हुई, स्वच्छ, चमकती रहे।
ऐसे प्रख्‍यात साहित्‍कार डा. केदारनाथ सिंह की दिवंगत आत्‍मा को हृदय से नम

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